मैं वो नही हूं
जो दिखती हू तुम्हे
जिम्मेदारियों की
बोझ के तले
दबने के बाद!
मैं वो नही हूं
जो बच जाती है
घड़ी के काटो के पीछे
भागने के बाद!
दफ्तर के
दाव पेच से सेहमी
वो सिर्फ एक परेशानी है
जिसे मैं समझ के
तुम उलझ जाते हो।
भीड़ में उलझी
वो एक उलझन है
जिसे तुम
समझ नही पाते हो।
पसीने की लकीरों के पीछे
जो छुपी सी हसी है
वो मैं हूं।
बर्तन के आवाजों की सन्नाटो में
जो फिक्र बसी है
वो मैं हूं।
मैं बहोत कुछ हूं
और सब कुछ जो हूं
वो सिर्फ तुम्हारे लिए हूं।
मतलबी दुनिया की परत में
एक मुलायम सी बदरिया है सजी
वो मैं हूं।